section and everything up till
*/ ?> Leelaben Patel Archives - Shabdoni Sangathe

अगर पेड़ होती

घने जंगलों का अगर पेड़ होती,
रूपैया कमाने की ना दोड़ होती,
ना मंज़िल ना आशाओं की जोड़ होती।
घने जंगलों का अगर पेड़ होती ।

धरा पर ना होता कोई आशियाना ,
न होता कहीं पर भी आना या जाना,
घने जंगलों का अगर पेड़ होती ।

नहीं कुछ भी लेना सभी को ही देना,
नहीं स्वार्थ खेला नहीं मन भी मैला,
घने जंगलों का अगर पेड़ होती ।

न दिक्षा न शिक्षा न अरमान कोई,
ना लेना किसी से कभी ज्ञान कोई,
घने जंगलों का अगर पेड़ होती ।

जरूरत नहीं कागजों या क़लम की,
दवा ना दुआ ना या कोई मलम की,
घने जंगलों का अगर पेड़ होती।

🖊️ Leelaben Patel

ઘસી

જીવન જીવ્યા જાત ઘસી,
મ્હેક ઉઠી ઓકાત ઘસી.

હસતું રાખ્યું છે મુખડું,
મ્હોરા પર આઘાત ઘસી.

આંખે કાજળનું કામણ,
અજવાળા પર રાત ઘસી.

શબ્દ ફરે છે પાંખો લઈ,
અફવાઓની વાત ઘસી.

જીવનને ચિતરવાનું,
કુદરતના રંગો સાત ઘસી.

પીંછી પણ બુઠી થઈ ગઈ,
ભીંતો પર એકાંત ઘસી.

સિંદૂરવર્ણી સાંજ સજે,
પ્રેમ પરમ અજ્ઞાત ઘસી.

🖊️Leelaben Patel

असर

दवाएं काम ना आयी दुवाओं का असर है ये,
नगर को छोड आये नई जगाओं का असर है ये।

वो झंझावत चमका गई तभी मालूम हुआ कि,
पडी थी धूल उड गई सब हवाओं का असर है ये।

सलामत घोंसला छोडा गगन से भेंट हो गई है,
अचानक छोड दी थी वो प्रथाओं का असर है ये।

जली थी आग भस्मीभूत हुआ दुर्भाव भीतर का,
मिली है सोच में कुछ नई दिशाओं का असर है ये।

हुआ जब कम दरद तो लोग खुशियाँ बांटने आये,
‘झलक’ अपने ही जीवन की अदाओं का असर है ये।

🖊️लीलाबहन पटेल ‘झलक’