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*/ ?> हिन्दी साहित्य Archives - Shabdoni Sangathe

અણસારમાં

બંધારણ: ગાગાલગા×૪

થોડો સમય જાતાં ફરક દેખાય છે વ્યવહારમાં,
વ્યવહારનો ઉત્તર મળે છે શબ્દના થડકારમાં.

આખો સમંદર પાર કરવાનો રહે બાકી હજી,
તૂફાનથી હારીને અટકે કેમ રે મઝધારમાં.

એક મૂંઝવણની ઓરડીમાં રોશની છે ધૂંધળી,
પણ દ્રશ્ય આખું જોઈ લીધું માત્ર એક અણસારમાં.

જીવનની બાજીમાં ભલે આવ્યો હશે એક્કો છતાં,
જોજે જરા પલટી જશે એ આંખનાં પલકારમાં.

ખીલી ઉઠે સૌંદર્ય જાણે રૂપનાં શણગારથી,
સોનું કે ચાંદી ઝાંખું પડશે કુદરતી શણગારમાં.

🖊️Ami Maheta

पापा – Lekhanotsav

किस जहां में मुझे आप छोड़ अाए नहीं दिखता कोई चहेरा अपना,
बहुत मनाया मन को फिर भी दोडता है आपकी ओर आप ही इसे समझाओ ना पापा !

बचपन की वो यादें जब याद आती हैं तो दिल को खुदर देती हैं,
फिर से एकबार मेरे कान में आकर ‘ लाडो’ कहे के पुकारोंना पापा !

दल दल की ठोकरें मिलती हैं यहां, कोई उठाने को हाथ नहीं फैलाता,
बार बार गीर के पैर लथड चुके हैं अब आप आके मेरा हाथ पकड़लोना पापा !

‘ कैसी हो?’ कोई नहीं पूछे यहां आपने तो कहां था सब होगे मेरी तरहां,
जिंदगी की सारी शिकायतें आप से करनी है मेरे पास बैठ के मुझे सहेलाओना पापा !

बड़ा मतलबी है ये जहां, रुठो यहां तो कोई मनाने भी नहीं आता,
जब जब रूठते आप में पट्ट आपको मना लेती इसबार रूठी हूं मैं मुझे मनालोना पापा !

आपकी तराह ना पाले मुझे ये जहां, आपके बिना लगे अकेला यहां,
नहीं करूगी एक भी शिकायत जिंदगी की, बस एकबार आपके पास मुझे बूलालोना पापा !

🖊️ Darshna Lakum

मुलाकात – Lekhanotsav

मेरे छोटे से कमरे में, मेरी मुझसे मुलाकात हुई हैं,
जिस्म सिराहने रख रूह से, थोड़ी सी कुछ बात हुई हैं।

मैं तो खामोश बैठा था, पर दिल मेरा सब बोल रहा था,
कोरे से एक पन्ने पर मानो, स्याही की बरसात हुई हैं।।

मैं सारी दुनिया देख रहा था, एक कोने में बैठा बस,
अपनों की राह तकने में, यूँ बैठे- बैठे रात हुई है।

एक तमाशा ये भी देखा, मैंने दुनिया वालों का,
ज़िंदा रहते जुदा हुए सब, मरने पर दुनिया साथ हुई हैं।।

कुछ यूँ चढ़ा हैं नशा ये सबको, भेड़ चाल चलने का,
जैसे कि काँटों वाली भी, राहें ये ख़राबात हुई हैं।

अपने हक को पाने को, लड़ना पड़ता हैं खुद से ही,
खुद से लड़ लड़ कर मेरी, खत्म सारी मुदारात हुई हैं।।

🖊️Akash Yadav