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पापा – Lekhanotsav

किस जहां में मुझे आप छोड़ अाए नहीं दिखता कोई चहेरा अपना,
बहुत मनाया मन को फिर भी दोडता है आपकी ओर आप ही इसे समझाओ ना पापा !

बचपन की वो यादें जब याद आती हैं तो दिल को खुदर देती हैं,
फिर से एकबार मेरे कान में आकर ‘ लाडो’ कहे के पुकारोंना पापा !

दल दल की ठोकरें मिलती हैं यहां, कोई उठाने को हाथ नहीं फैलाता,
बार बार गीर के पैर लथड चुके हैं अब आप आके मेरा हाथ पकड़लोना पापा !

‘ कैसी हो?’ कोई नहीं पूछे यहां आपने तो कहां था सब होगे मेरी तरहां,
जिंदगी की सारी शिकायतें आप से करनी है मेरे पास बैठ के मुझे सहेलाओना पापा !

बड़ा मतलबी है ये जहां, रुठो यहां तो कोई मनाने भी नहीं आता,
जब जब रूठते आप में पट्ट आपको मना लेती इसबार रूठी हूं मैं मुझे मनालोना पापा !

आपकी तराह ना पाले मुझे ये जहां, आपके बिना लगे अकेला यहां,
नहीं करूगी एक भी शिकायत जिंदगी की, बस एकबार आपके पास मुझे बूलालोना पापा !

🖊️ Darshna Lakum

Published by Deep Gurjar

Deep Gurjar, Gir-Somnath based an author, published one poetry book on his name, which name is "the poetry of a common man". He is the founder of "Shabdoni Sangathe" group. This group supports new poet & writer for developing their skills. & Also motivate them by organizing different different competitions and post their writeups on social media. SNS group publish an e-magazine every month. Deep Gurjar is a columnist also in Sanjog News & Sorath Dhara (Saptahik). & By educational qualification he is a student of B.tech (Dairy Technology).

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